रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता उज्जवल दीपक ने कर्नाटक में कांग्रेस के ‘ढाई-ढाई साल’ के फार्मूले के तहत डी.के. शिवकुमार की ताजपोशी पर तीखा तंज कसा है। प्रवक्ता उज्जवल दीपक ने कहा कि यह फार्मूला लोकतंत्र या सुशासन का नहीं, बल्कि कांग्रेस आलाकमान (10 जनपथ) की ‘उगाही’ और आपसी बन्दरबाँट का एक नया मॉडल है।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता दीपक ने राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए कहा कि जिन डी.के. शिवकुमार पर खुलेआम अपने ही कार्यकर्ताओं से मारपीट करने और भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे हैं, उन्हें राहुल गांधी ने सिर्फ इसलिए नामित किया क्योंकि कांग्रेस में योग्यता की नहीं, बल्कि ‘आकाओं’ की तिजोरी भरने की होड़ मची है। कांग्रेस पार्टी का चरित्र हमेशा से ‘लूटो और बाँटो’ का रहा है। कर्नाटक की जनता अब इस नए समझौते के तहत भ्रष्टाचार की नई चक्की में पिसने के लिए मजबूर होगी। छत्तीसगढ़ के पिछले कांग्रेस शासन में ढाई-ढाई साल के इस फार्मूले के फेल होने की चर्चा करते हुए प्रवक्ता उज्जवल दीपक ने सवाल उठाया कि आखिर यही फार्मूला छत्तीसगढ़ में तब कारगर साबित क्यों नहीं हुआ? क्या टी.एस. सिंहदेव इस फार्मूले को चलाने के काबिल नहीं थे? सिंहदेव तब इतने सक्रिय और मुखर क्यों नहीं हुए? उन्होंने इसकी वजह बताई कि छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल का फार्मूला इसलिए फेल हो गया क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूरे प्रदेश का पैसा, छत्तीसगढ़िया जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर दिल्ली में बैठे अपने आकाओं के कदमों में रख दिया था। दिल्ली दरबार को खुश रखने की इसी ‘आर्थिक क्षमता’ के दम पर बघेल ने पूरे पांच साल अपनी कुर्सी बचाए रखी।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता दीपक ने कर्नाटक के घटनाक्रम पर कटाक्ष करते हुए सवाल दागा कि अगर कर्नाटक में यह ढाई साल वाला फार्मूला सफल हो रहा है, तो इसके क्या मायने हैं? क्या वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने 10 जनपथ के नेताओं को छत्तीसगढ़ की तर्ज पर खुश रखने में नाकाम रहे, या फिर भावी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने दिल्ली दरबार को उससे भी कहीं अधिक बड़ी राशि की पेशकश कर दी है? कांग्रेस नेतृत्व को जनता के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए। छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव (बाबा) की राजनीतिक लाचारी और उनके हालिया बयानों पर भाजपा प्रदेश प्रवक्ता उज्जवल दीपक ने बेहद तल्ख टिप्पणी की कि कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार ने इस फार्मूले के तहत अपनी पार्टी को वादाखिलाफी नहीं करने दी। उन्होंने कांग्रेस के हलक में ‘हाथ’ डालकर अपना अधिकार ले लिया, भले इसके लिए सरकार बने या न बने। इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के ‘बाबा’ समूचे पाँच वर्ष तक दैन्य के साथ दिल्ली दरबार से अपने अधिकार की भीख मांगते रह गए। नतीजा क्या हुआ? अंतिम कुछ दिनों के लिए उन्हें उपमुख्यमंत्री का एक ‘झुनझुना’ पकड़ा दिया गया। राहुल गांधी के पाँव छूना और एक ही भाषण में 150 बार ‘सर-सर’ कहना भी उनके किसी काम नहीं आया। उन्होंने कहा कि जितना दुस्साहस टी.एस. सिंहदेव ने हाल ही में पूज्य जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी के संदर्भ में किया है, काश उसका रंच मात्र साहस भी वे ढाई-ढाई साल के फार्मूले को लागू करने के लिए अपना अधिकार मांगने में दिखा पाते! जहाँ बोलना चाहिए था, वहाँ जुबान सिल कर सिंहदेव ने अपना लोक बिगाड़ा, और अब जहाँ नहीं बोलना चाहिए (संतों के खिलाफ), वहाँ अनाप-शनाप बोलकर अपना परलोक भी बिगाड़ रहे हैं।
